फिर कानूनी बहस के केंद्र में लालू, सजायाफ्ता होने के बाद भी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट 22 को करेगा अंतिम फैसला

न्यूज स्कैन ब्यूरो, नई दिल्ली
देश के बहुचर्चित चारा घोटाला मामले में दोषी ठहराए जा चुके राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव एक बार फिर कानूनी बहस के केंद्र में हैं। उनकी सज़ा पर रोक (Sentence Suspension) के खिलाफ दाखिल याचिका पर अब सुप्रीम कोर्ट 22 अप्रैल को अंतिम सुनवाई करने जा रहा है। यह सुनवाई तय करेगी कि क्या सजायाफ्ता होने के बावजूद उन्हें मिली जमानत न्यायिक कसौटियों पर खरी उतरती है या नहीं।

High Court के फैसले पर उठे सवाल
देवघर कोषागार से अवैध निकासी से जुड़े मामले में विशेष CBI अदालत द्वारा साढ़े तीन साल की सज़ा सुनाए जाने के बाद लालू यादव ने इस फैसले को चुनौती देते हुए झारखंड उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने अपील लंबित रहने तक उनकी सजा को निलंबित करते हुए उन्हें जमानत दे दी थी।

हालांकि, जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने इस राहत को नियमों के विरुद्ध बताते हुए शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। एजेंसी का तर्क है कि आर्थिक अपराधों में दोषसिद्धि के बाद सजा निलंबन अपवाद की स्थिति में ही दिया जाना चाहिए, जबकि इस मामले में स्थापित मानकों की अनदेखी की गई।
कानूनी स्थिति स्पष्ट है, लालू यादव को ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार दिया है। उनकी सजा खत्म नहीं हुई है। अपील लंबित रहने तक सजा को अस्थायी रूप से रोका गया है। अर्थात्, वे तकनीकी रूप से दोषसिद्ध हैं, लेकिन न्यायालय के अंतरिम आदेश के चलते जेल से बाहर हैं।

उम्र और स्वास्थ्य भी बने राहत का आधार
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस तथ्य का भी उल्लेख किया कि मामले में शामिल कई दोषी अब 60 से 80 वर्ष की आयु के बीच हैं। अदालत ने संकेत दिया कि अपील के अंतिम निपटारे में समय लग सकता है, ऐसे में मानवीय और व्यावहारिक पक्षों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

950 करोड़ रुपये के गबन से जुड़ा है मामला
चारा घोटाला अविभाजित बिहार के सरकारी खजाने से 1990 के दशक में की गई लगभग 950 करोड़ रुपये की अवैध निकासी से जुड़ा है। उस समय लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री के साथ-साथ वित्त और पशुपालन विभाग के प्रभारी भी थे। इसी प्रकरण में विभिन्न कोषागारों से फर्जी बिलों के माध्यम से सरकारी धन निकाले जाने के आरोप साबित हुए थे।

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजरें
22 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में शीर्ष अदालत यह तय करेगी कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई राहत बरकरार रहेगी या सजा निलंबन का आदेश निरस्त कर दोषियों को पुनः जेल भेजा जाएगा। यह फैसला न सिर्फ लालू यादव की व्यक्तिगत कानूनी स्थिति को प्रभावित करेगा, बल्कि आर्थिक अपराधों में दोषसिद्ध व्यक्तियों को मिलने वाली राहत के मानकों पर भी महत्वपूर्ण न्यायिक दिशा तय कर सकता है।