आरोप, अदालत और ‘राजनीतिक नैरेटिव’: क्या फिर उसी रणनीति पर हैं लालू प्रसाद?

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
लैंड फॉर जॉब मामले में एक बार फिर राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने खुद पर लगे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने जमीन के बदले नौकरी देने जैसी कोई प्रक्रिया न तो अपनाई और न ही इसकी जानकारी उन्हें थी। यह कथित मामला वर्ष 2004 से 2009 के बीच का है, जब वे केंद्र में रेल मंत्री थे।

16 फरवरी 2026 को हुई सुनवाई के दौरान उन्होंने अदालत के समक्ष खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि वे कानूनी प्रक्रिया के तहत इस मामले का सामना करेंगे। हालांकि, जांच एजेंसियों की ओर से अदालत में पेश की गई दलीलों में यह संकेत दिया गया कि प्रथम दृष्टया इस पूरे मामले में उनके परिवार की भूमिका की जांच जरूरी है।

पुराना पैटर्न: चारा घोटाले से लेकर आज तक
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह पहली बार नहीं है जब लालू प्रसाद यादव ने किसी बड़े आरोप को राजनीतिक साजिश बताया हो। इससे पहले चारा घोटाला मामले में भी उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि जांच का आदेश उन्होंने स्वयं दिया था और कार्रवाई की अनुमति भी दी थी। इसके बावजूद, लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद वे इस मामले में दोषी ठहराए गए, जिसके परिणामस्वरूप उनके चुनाव लड़ने पर रोक भी लगी।

‘पीड़ित राजनीति’ का फ्रेमवर्क
बिहार की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकारों का मानना है कि आरोपों के बीच खुद को एक ‘राजनीतिक रूप से निशाना बनाए गए नेता’ के तौर पर प्रस्तुत करना, लालू यादव की स्थापित रणनीति का हिस्सा रहा है। इस नैरेटिव के जरिए वे अपने समर्थकों के बीच यह संदेश स्थापित करने की कोशिश करते रहे हैं कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेतृत्व को सुनियोजित तरीके से कमजोर किया जा रहा है। यही कारण है कि एम-वाई (मुस्लिम-यादव) सामाजिक समीकरण के भीतर यह भावनात्मक अपील लंबे समय तक राजनीतिक ऊर्जा का स्रोत बनी रही।

बदला हुआ सामाजिक गणित, नई चुनौती
हाल के वर्षों में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच राजद के परंपरागत वोट बैंक में भी बदलाव के संकेत मिले हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या एक बार फिर ‘संघर्ष बनाम साजिश’ का राजनीतिक फ्रेम, जनाधार को पुनर्संगठित करने में प्रभावी साबित होगा? लैंड फॉर जॉब मामले में कानूनी लड़ाई अपने रास्ते पर है, लेकिन समानांतर रूप से राजनीतिक मंच पर भी नैरेटिव की जंग तेज होती दिख रही है।