न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
साल 2025 के चुनावी नतीजों ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के भीतर उस असंतोष को सतह पर ला दिया है, जो लंबे समय से सुलग रहा था। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के लिए अब राह आसान नहीं दिख रही है। एक तरफ जहाँ बड़ी बहन रोहिणी आचार्य ने ‘लालूवाद’ के कमजोर होने की दुहाई दी, वहीं अब बड़े भाई तेजप्रताप यादव के तीखे तेवरों ने इस आंतरिक कलह को ‘भाई बनाम भाई’ की लड़ाई में बदल दिया है। अब पार्टी के वरिष्ठ नेता भाई वीरेंद्र के तेवर भी विद्रोही दिखने लगे हैं।
तेजस्वी यादव के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ उन्हें अपने परिवार को संतुष्ट करना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के पुराने लोगों का भरोसा जीतना है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि यदि तेजस्वी ने अपनी ‘कोर टीम’ में बदलाव नहीं किया और जमीनी फीडबैक को अनसुना किया, तो राजद के भीतर यह बिखराव और गहरा सकता है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि तेजस्वी अब अपनों के ही बनाए चक्रव्यूह में घिर गए हैं। आइए जानते हैं इस राजनीतिक संकट के मुख्य पहलू:
- तेजप्रताप का हमला: “सलाहकारों ने डुबोई लंका”
तेजप्रताप यादव अक्सर अपने बयानों से अपनी ही पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करते रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी नाराजगी सीधे तेजस्वी की ‘कोर टीम’ पर है। तेजप्रताप का मानना है कि तेजस्वी कुछ ऐसे चाटुकार और बाहरी सलाहकारों से घिरे हैं, जिन्हें बिहार की जमीनी हकीकत का पता नहीं है। तेजप्रताप ने आरोप लगाया है कि जो कार्यकर्ता दशकों से लालू जी के साथ लाठियां खाते आए, उन्हें किनारे कर दिया गया। उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि तेजस्वी को ‘अभिमन्यु’ की तरह अपनों ने ही घेर लिया है, और ये सलाहकार उन्हें सही फीडबैक नहीं दे रहे हैं। - रोहिणी आचार्य: ‘घुसपैठियों’ पर निशाना
रोहिणी ने पहले ही सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से यह संकेत दे दिया था कि पार्टी की मौजूदा बदहाली के पीछे वे ‘घुसपैठिए’ हैं जो लालू यादव की विचारधारा को खत्म करना चाहते हैं। उनका तर्क है कि पार्टी का वर्तमान नेतृत्व असली ‘लालूवादियों’ को पहचानने में चूक कर रहा है। तेजस्वी के खिलाफ रोहिणी काफी मुखर रही हैं। - संगठन में विद्रोह: भाई वीरेंद्र के गंभीर सवाल
पार्टी के भीतर केवल परिवार ही नहीं, बल्कि भाई वीरेंद्र जैसे कद्दावर नेता भी अब मुखर हैं। उन्होंने टिकट बंटवारे में हुई धांधली और दिनारा सीट जैसे उदाहरण देकर यह साबित करने की कोशिश की है कि नेतृत्व के फैसले ‘आत्मघाती’ रहे। स्थानीय नेताओं को दरकिनार कर बाहरी लोगों को तरजीह देना हार का सबसे बड़ा कारण बना। - गठबंधन का भविष्य: कांग्रेस की ‘ना’
बाहरी मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है। कांग्रेस के भीतर अब यह राय प्रबल हो रही है कि राजद के साथ रहने से उन्हें नुकसान हो रहा है। दिल्ली में हुई बैठक में कांग्रेस विधायकों की दो-टूक बात ने साफ कर दिया है कि वे अब अकेले चलने या नए विकल्पों पर विचार करने के मूड में हैं।



























