न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
नए साल के पहले दिन एक नई पारी की शुरुआत और छठे दिन अचानक उसका अंत। 1989 बैच के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और बिहार के पूर्व कार्यकारी डीजीपी आलोक राज ने BSSC के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर राज्य के ब्यूरोक्रेटिक सर्कल में एक ऐसी हलचल पैदा कर दी है, जिसे केवल ‘निजी कारणों’ के पर्दे के पीछे नहीं छिपाया जा सकता।
यह इस्तीफा केवल एक अधिकारी के पद छोड़ने की खबर नहीं है, बल्कि बिहार की उस चयन प्रणाली की स्थिति को दर्शाता है जहाँ एक अनुभवी अफसर काम करने के बजाय इस्तीफा देना बेहतर समझता है। यह ‘सिस्टम’ की विफलता है या किसी बड़े ‘दबाव’ का परिणाम, यह आने वाले दिनों में और स्पष्ट होगा।
एक साल का ‘प्रभार’ बनाम 6 दिन का ‘स्थायी पद’
आलोक राज के इस कदम का सबसे रोचक पहलू यह है कि वे पिछले एक साल से इस पद का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे। जब 31 दिसंबर 2025 को वे रिटायर हुए, तो सरकार ने उनके अनुभव पर भरोसा जताते हुए उन्हें 5 साल के लिए पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त किया। सवाल यह है कि जो व्यक्ति साल भर से काम को देख रहा था, उसने पूर्ण प्रभार मिलने के महज 144 घंटों में ही किन ‘अपरिहार्य परिस्थितियों’ को देख लिया कि उसे पद छोड़ना पड़ा?
‘काजल की कोठरी’ और साख का संकट
मीडिया रिपोर्टों और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि आलोक राज जैसे ‘साफ-सुथरी’ छवि वाले अधिकारी के लिए BSSC जैसी संस्था को संभालना एक बड़ी चुनौती थी। सिस्टम में ‘मिसमैच’: सूत्रों के अनुसार, चयन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और नियुक्तियों में उनकी पसंद को तरजीह नहीं मिल रही थी। BSSC का अतीत पेपर लीक और विवादों से भरा रहा है। एक सख्त प्रशासक के रूप में आलोक राज शायद उस ‘सिस्टम’ में खुद को फिट नहीं पा रहे थे जहाँ हस्तक्षेप की गुंजाइश अधिक रहती है।
‘डीजीपी’ से ‘बीएससी’ तक का सफर
आलोक राज बिहार के वरिष्ठतम आईपीएस अधिकारियों में से एक रहे हैं। वे 105 दिनों तक बिहार के कार्यकारी डीजीपी भी रहे और पुलिस भवन निर्माण निगम के एमडी के तौर पर उन्होंने कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा कराया। वीरता पदक विजेता और भूगर्भशास्त्र में गोल्ड मेडलिस्ट रहे राज का अचानक हटना सरकार के उस फैसले पर भी सवाल उठाता है जिसमें सेवानिवृत्त अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती हैं।
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