न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
तेजस्वी यादव ने नए साल के स्वागत के लिए ‘संकल्प, विचार और विश्वास’ जैसे शब्दों का चयन किया है। राजनीति में इन शब्दों के मायने सिर्फ शुभकामनाओं तक सीमित नहीं होते। बिहार की राजनीति जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां तेजस्वी, आरजेडी और महागठबंधन के सामने चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं। तेजस्वी का ‘नूतन वर्ष 2026’ के लिए यह संदेश दरअसल उनके समर्थकों के लिए एक कॉल-टू-एक्शन है। उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया ‘जुनून’ शब्द यह संकेत देता है कि आने वाले समय में आरजेडी और महागठबंधन एक आक्रामक मुद्रा में रहने वाले हैं।
1. ‘MY’ समीकरण से ‘A to Z’ तक की कठिन राह
तेजस्वी पिछले काफी समय से आरजेडी को सिर्फ यादव और मुस्लिम (MY) की पार्टी की छवि से निकालकर ‘A to Z’ (सभी वर्गों की पार्टी) बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 2026 में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की होगी कि क्या वह वाकई सवर्णों और अति पिछड़ों (EBC) का भरोसा जीत पाए हैं। बिना इस विस्तार के, सत्ता की दहलीज तक पहुंचना या उसे बरकरार रखना मुश्किल है।

2. नीतीश कुमार और गठबंधन की केमिस्ट्री
महाठबंधन के भीतर ‘बड़े भाई’ की भूमिका को लेकर रस्साकशी हमेशा बनी रहती है। नीतीश कुमार की बदलती भूमिकाओं के बीच तेजस्वी के लिए चुनौती यह है कि वह महागठबंधन के अन्य साथियों (कांग्रेस और वामपंथी दलों) को कैसे एकजुट रखते हैं। 2026 में सीटों के तालमेल और सरकार या विपक्ष के भीतर आपसी सामंजस्य उनकी लीडरशिप का सबसे बड़ा टेस्ट होगा।
3. ‘ब्रांड तेजस्वी’ बनाम ‘बीजेपी की मशीनरी’
बीजेपी की संगठनात्मक शक्ति और उनके आक्रामक हिंदुत्व कार्ड के सामने तेजस्वी का ‘मुद्दों की राजनीति’ (रोजगार और पढ़ाई-दवाई-कमाई) वाला नैरेटिव कितना टिक पाता है, यह देखने वाली बात होगी। तेजस्वी के लिए चुनौती यह है कि वह युवाओं के बीच अपनी लोकप्रियता को वोट में तब्दील करना जारी रखें।
4. जन सुराज और वोट बैंक में सेंधमारी
प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ ने बिहार के राजनीतिक मैदान में एक नया कोण बना दिया है। पीके सीधे तौर पर आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक और युवा वोटरों को निशाना बना रहे हैं। तेजस्वी के लिए यह साल इस नई चुनौती से निपटने की रणनीति तैयार करने का होगा, ताकि उनके बेस वोट में कोई बड़ी सेंध न लग सके।
5. रोजगार का वादा और साख की लड़ाई
तेजस्वी ने बिहार में ‘नौकरी’ को राजनीति का केंद्र बनाया है। अगर वह सत्ता में हैं, तो उन नियुक्तियों को पूरा करना और अगर विपक्ष में हैं, तो सरकार को इस मुद्दे पर घेरते रहना उनकी सबसे बड़ी ताकत और चुनौती दोनों है। जनता अब केवल वादों पर नहीं, बल्कि ‘डिलीवरी’ पर भरोसा कर रही है।


























