राज्यसभा सीट से लेकर संगठन तक : जीतन राम मांझी के तीखे तेवर क्या एनडीए के भीतर बेचैनी का संकेत हैं?

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
गया में आयोजित हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के अभिनंदन समारोह में जीतन राम मांझी का सार्वजनिक रूप से फूटा आक्रोश केवल एक मंचीय भाषण नहीं था, बल्कि यह एनडीए के भीतर छोटे सहयोगी दलों की बढ़ती असंतुष्टि और राजनीतिक हाशिए पर जाने की पीड़ा का स्पष्ट संकेत भी था। जीतन राम मांझी के तेवर केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं हैं। यह बिहार की गठबंधन राजनीति में छोटे दलों की उस बेचैनी की आवाज़ है, जो सत्ता में तो हैं, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में खुद को कमजोर महसूस कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि यह नाराज़गी सिर्फ मंच तक सीमित रहती है या फिर ‘हम’ पार्टी अपने लिए नई राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश करती है।

पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री मांझी ने जिस तरह अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बेटे संतोष सुमन को मंच से फटकार लगाई, उसने साफ कर दिया कि मामला सिर्फ एक राज्यसभा सीट का नहीं, बल्कि पार्टी की पहचान, आत्मसम्मान और दीर्घकालिक अस्तित्व से जुड़ा है।

राज्यसभा सीट : वादों और हकीकत के बीच फंसी ‘हम’
मांझी का दावा है कि 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान गठबंधन स्तर पर उन्हें दो लोकसभा और एक राज्यसभा सीट का भरोसा दिलाया गया था। आज जब राज्यसभा की 7 में से अधिकांश सीटों का बंटवारा भाजपा, जदयू और लोजपा के बीच हो चुका है और ‘हम’ को बाहर रखा गया है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एनडीए में छोटे दल सिर्फ संख्या पूरक बनकर रह गए हैं?

मांझी का यह कहना कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मंत्री बनाने के लिए धन्यवाद दिया, लेकिन राज्यसभा को लेकर असंतोष भी खुलकर जताया—यह संतुलन साधने की मजबूरी को भी दर्शाता है। वे नाराज़ हैं, लेकिन गठबंधन तोड़ने की स्थिति में नहीं।

संतोष सुमन पर नाराजगी: वंशवाद नहीं, संगठन की चिंता?
अपने बेटे और पार्टी अध्यक्ष संतोष सुमन को लेकर मांझी की तल्ख टिप्पणी महज पारिवारिक असहमति नहीं थी। यह संकेत था कि मांझी अब पार्टी को सिर्फ सत्ता में हिस्सेदारी तक सीमित नहीं रखना चाहते।

“अगर पार्टी को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाना है, तो मंत्री पद का मोह छोड़ना होगा”—यह कथन दरअसल यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ‘हम’ पार्टी सत्ता की सुविधा में उलझकर संगठन विस्तार की लड़ाई हार रही है?

मांझी का आरोप कि सीट बंटवारे के वक्त पार्टी नेतृत्व ने मजबूती से बात नहीं रखी, यह बताता है कि अंदरखाने रणनीतिक कमजोरी को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है।

अकेले लड़ने का संकेत या दबाव की राजनीति?
मांझी का यह दावा कि अगर पार्टी 100 सीटों पर अकेले लड़ती तो 6 प्रतिशत वोट हासिल कर राष्ट्रीय मान्यता पा सकती थी…यह बयान दोहरे अर्थ रखता है।
एक तरफ यह आत्मविश्वास का प्रदर्शन है, दूसरी ओर एनडीए पर यह दबाव भी कि ‘हम’ को हल्के में न लिया जाए।
हालांकि बिहार की जमीनी राजनीति में यह दावा कितना व्यवहारिक है, यह बहस का विषय है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि मांझी अब केवल गठबंधन की बैसाखी पर चलने को तैयार नहीं दिखते।

क्या आगे और तीखे होंगे सुर?
मीडिया से बातचीत में मांझी ने राज्यसभा सीट का दावा छोड़ने से साफ इनकार कर दिया। साथ ही यह चेतावनी भी दी कि गठबंधन में रहना अपने हक की मांग छोड़ देना नहीं होता।
यह बयान आने वाले दिनों में एनडीए के भीतर सीट बंटवारे, सम्मान और भूमिका को लेकर नई खींचतान की ओर इशारा करता है।