पीके का प्रयोग : चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ ने 238 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन 99% उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। हालांकि, उन्होंने लगभग 20 सीटों पर परिणाम प्रभावित किए।
चिराग का उदय : लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के मुखिया चिराग पासवान ने 29 में से 19 सीटें जीतकर 65% से अधिक का स्ट्राइक रेट हासिल किया और खुद को रामविलास पासवान के असली राजनीतिक वारिस के रूप में स्थापित किया।
वोट-कटवा की भूमिका: जन सुराज ने महागठबंधन के वोट काटकर NDA को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुँचाया। प्रशांत पर आरोप यह भी लगे कि वे भाजपा की बी टीम की तरह काम कर रहे थे।
मुकेश सहनी की निराशा : ‘सन ऑफ मल्लाह’ कहे जाने वाले मुकेश सहनी को अपनी ही जाति का अपेक्षित समर्थन नहीं मिला, जिससे महागठबंधन को झटका लगा।
प्रशांत किशोर: मसीहा से राजनेता बनने की राह में बड़ी चूक
बिहार में चुनावी रणनीति के धुरंधर प्रशांत किशोर (पीके) ने ‘जन सुराज’ के माध्यम से जिस बड़े राजनीतिक बदलाव का सपना दिखाया था, उसके परिणाम उम्मीदों के विपरीत रहे हैं। महात्मा गांधी की चंपारण सत्याग्रह शैली में तीन साल की लंबी पदयात्रा और ‘सिस्टम बदलने’ के नारों के बावजूद, जन सुराज के 99 प्रतिशत उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।
पीके ने अपनी पार्टी के टिकट वितरण में उन्हीं पुराने जातीय समीकरणों का सहारा लिया, जिसका वे अक्सर विरोध करते रहे थे। इसके अलावा, उन पर ‘पैसे लेकर टिकट बांटने’ जैसे गंभीर आरोप भी लगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक सफल ‘कोच’ का खुद मैदान में उतरकर ‘खिलाड़ी’ बनने का प्रयास उनकी सबसे बड़ी चूक साबित हुई।
अप्रत्यक्ष प्रभाव और भविष्य की जमीन:
भले ही जन सुराज सदन में प्रवेश नहीं कर पाया, लेकिन उसने लगभग 20 ऐसी सीटों पर परिणाम को प्रभावित किया है, जहां उसके उम्मीदवारों ने महागठबंधन के वोटों में सेंध लगाई, जिसका सीधा फायदा सत्तारूढ़ NDA गठबंधन को मिला। यह प्रयोग भले ही चुनाव जीतने में विफल रहा हो, लेकिन इसने भविष्य की राजनीति के लिए एक जमीन तैयार की है। कमजोर विपक्ष की स्थिति में, पीके अब सदन के बाहर से ही विपक्ष की एक मजबूत आवाज बनने की संभावना रखते हैं।
चिराग पासवान : NDA की जीत में निर्णायक ‘फैक्टर’
दूसरी ओर, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने इस चुनाव में खुद को एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित किया है। NDA के साथ चुनाव लड़ते हुए, उन्होंने 29 में से 19 सीटें जीतीं। यह प्रभावशाली स्ट्राइक रेट न केवल उनके राजनीतिक करियर का टर्निंग पॉइंट है, बल्कि यह साबित करता है कि वह अब अपने पिता रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत के इकलौते और मजबूत वारिस हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में JDU के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले चिराग का इस बार NDA के साथ आना गठबंधन के लिए एक बड़ा गेम चेंजर साबित हुआ। उनके कारण पासवान समुदाय के साथ-साथ अति पिछड़ी जातियों का एक महत्वपूर्ण समूह भी NDA के साथ मजबूती से जुड़ा। चिराग स्वयं दावा करते हैं कि अगर पिछली बार वह NDA से अलग नहीं हुए होते, तो महागठबंधन पिछली बार ही समाप्त हो जाता। उनकी वापसी ने NDA के सामाजिक आधार को व्यापक मजबूती दी।
मुकेश सहनी की असफलता: महागठबंधन को लगा झटका
महागठबंधन ने मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर उनसे काफी उम्मीदें पाल रखी थीं, खासकर मल्लाह समुदाय के वोटों को एकजुट करने की। हालांकि, ‘सन ऑफ मल्लाह’ कहे जाने वाले सहनी अपनी ही जाति का पूरा समर्थन जुटाने में विफल रहे, जिससे महागठबंधन को बड़ी निराशा हाथ लगी।

सियासी गलियारों में चर्चा यह भी है कि महागठबंधन के भीतर ही कुछ आंतरिक समीकरणों ने सहनी के प्रभाव को सीमित किया। सहनी की विफलता दर्शाती है कि जातीय समीकरणों पर आधारित राजनीति में भी, केवल उपनाम या पद मिलना पर्याप्त नहीं है; जमीनी स्तर पर विश्वास और एकजुटता कहीं अधिक मायने रखती है। चर्चा है कि तेजस्वी ने ही पहले सहनी को कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया और फिर उनके पर कतर दिये। अतिमहत्वाकाक्षी मुकेश सहनी ने खुद के लिए डिप्टी सीएम की घोषणा तो करवा ली लेकिन नतीजों में जमीन पर शून्य रहे।
कुल मिलाकर, बिहार के इस चुनाव ने दिखा दिया कि सफल रणनीतिकार का सफल राजनेता होना जरूरी नहीं है, और छोटे दल भी यदि सही समय पर सही गठबंधन का चुनाव करें, तो वे सत्ता के समीकरणों को निर्णायक रूप से बदलने की क्षमता रखते हैं।


























