बिहार में बीजेपी का नया नैरेटिव : ‘जंगल राज’ से ‘महालठबंधन’ तक… भाषाई गोलाबारी में छिपा राजनीतिक गणित

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की सियासत में अब शब्द भी हथियार बन गए हैं। बीजेपी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत ऐसे लहजे में की है, जिसमें हर शब्द विपक्ष की नसों पर वार करता है… ‘जंगल राज’, ‘महालठबंधन’, ‘लालू यादव के बेटे’, ‘शहाबुद्दीन का बेटा’।
और इन शब्दों के पीछे सिर्फ तंज नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति छिपी है… मतदाता की स्मृति में “डर” को फिर से जगाने की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समस्तीपुर और बेगूसराय से अपने अभियान का आगाज किया और “महागठबंधन” को “महालठबंधन” कहा।
यह शब्द बिहार की राजनीति के पुराने भय को जगा देता है। ‘लट्ठ’ या ‘लाठी’ से निकला यह शब्द याद दिलाता है उस दौर की, जब चुनाव में बाहुबली ही कानून थे।
मोदी के इस नए रूपक ने बिहार के मतदाता को सीधे 1990 के दशक की गलियों में पहुँचा दिया जहाँ “राजनीति का मतलब था डर और दबदबा”।

बीजेपी ने एक बार फिर वही पुराना नारा उठाया है …“जंगल राज”।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उस दौर में सबसे ज़्यादा पीड़ित बिहार की माताएँ और कमजोर वर्ग के लोग थे।
फिरौती, अपहरण, हत्या और रंगदारी, ये शब्द बिहार के अतीत से मिटे नहीं हैं, बस दबे हुए हैं।
बीजेपी चाहती है कि वे फिर से याद आएँ ताकि मतदाता “सुरक्षा” और “स्थिरता” के नाम पर एनडीए के पाले में लौटे।

गृह मंत्री अमित शाह ने सीवान और बक्सर की रैलियों में कहा, “14 तारीख को दोपहर 1 बजे लालू यादव के बेटे का सूपड़ा साफ़ होने वाला है।”
तेजस्वी यादव का नाम लिए बिना “लालू यादव के बेटे” कहना एक रणनीतिक बयान है।
इस एक वाक्य में बीजेपी ने पिता की सजा, परिवार की विरासत और विपक्ष के चेहरे…तीनों को एक फ्रेम में कैद कर दिया।
यह भाषाई राजनीति का सबसे प्रभावी उदाहरण है, जहाँ नाम नहीं, “संबंध” ही निशाना बन जाता है।
भाषणों में जैसे ही लालू कहा जाता है तो एक दौर रिफ्लेक्ट हो जाता है। भाजपा की यही रणनीति है।

अमित शाह ने ओसामा शहाब पर भी सीधा प्रहार किया, नाम नहीं लिया, लेकिन कहा “शहाबुद्दीन का बेटा”।
इस वाक्य ने सीवान की गलियों में फिर वही डर जगा दिया, जहाँ शहाबुद्दीन कभी सत्ता का दूसरा नाम हुआ करता था।
बीजेपी का संदेश साफ है… अगर महागठबंधन आया तो बिहार फिर उसी रास्ते लौटेगा। जब तेजस्वी यादव रोजगार और पलायन का मुद्दा उठाते हैं, तो बीजेपी उसी शब्द से पलटवार करती है। जेपी नड्डा ने कहा,
“शर्म आनी चाहिए तुम्हें, जब तुम्हारे वक्त की वजह से लोग भाग रहे थे।”

बीजेपी ने कांग्रेस और आरजेडी दोनों को “वंशवाद” के घेरे में रखा है।
मोदी ने कांग्रेस पर तंज कसा कि “सीताराम केसरी को अपमानित करने वाली पार्टी लोकतंत्र की बात न करे।”
वहीं शाह ने घुसपैठ के सवाल पर कहा, “वोटर लिस्ट में सुधार का विरोध करने वाले ही घुसपैठियों के हितैषी हैं।”
मतलब, बीजेपी एक साथ सुरक्षा, संस्कृति और परिवारवाद तीनों मोर्चों से विपक्ष को घेरना चाहती है।

इन नारों का सार यह नहीं कि बीजेपी सिर्फ शब्द खेल रही है,
बल्कि यह कि वह मतदाता की चेतना में “भय और भरोसे” का नया समीकरण गढ़ रही है।
जहाँ एक ओर “भ्रष्टाचार” और “जंगल राज” की स्मृति है,
वहीं दूसरी ओर “मोदी नेतृत्व” का भरोसा।

बिहार की 2025 की लड़ाई नारे या नाराजगी की नहीं, बल्कि नैरेटिव की लड़ाई है।
बीजेपी के पास अतीत की कहानियाँ हैं —
विपक्ष के पास भविष्य के वादे।
अब तय बिहार के मतदाता को करना है कि उसे “महालठबंधन” का लट्ठ याद रहेगा या “विकास” का रास्ता दिखाई देगा।