विश्वकर्मा पूजा में संक्रांति की प्रधानता :आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र

न्यूज स्कैन ब्यूरो, सुपौल

जिले में 17 सितंबर को महान शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा अर्चना की जाएगी। पूजा को लेकर बाजार में पूजन समाग्री की खरीदारी को लेकर भीड़ रही।
इस वार अमृत योग में मनेगी विश्वकर्मा पूजा।
इंदिरा एकादशी व्रत होने से विशिष्ट योगों का निर्माण।
बुधवार को इंदिरा एकादशी व्रत होने से अमृत योग की प्राप्ति।
विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त –प्रातः काल 5 बजकर 55 मिनट से प्रातः ही 7 बजकर 24 मिनट तक।
दूसरा मुहूर्त –प्रातः काल 8 बजकर 56 मिनट से 1 बजकर 32 मिनट तक।
तीसरा मुहूर्त – दोपहर के 3 बजकर 4 मिनट से संध्या काल 6 बजकर 5 मिनट तक शंकल्प पूजन का शुभ मुहूर्त रहेगी।
प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा जयंती विश्वकर्मा जयंती के रूप में संपूर्ण भारत में हर्षोल्लास के साथ धूमधाम से मनाया जाता है विश्वकर्मा पूजा की प्रधानता संक्रांति काल से है । आश्विनमास के कृष्ण पक्ष की संक्रांति विश्वकर्मा पूजा के नाम से जाने जाते हैं ।यह कहना है गोसपुर ग्राम निवासी आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र का। उन्होंने विश्वकर्मा भगवान के पूजन तत्व माहात्म्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विश्वकर्मा भगवान , अभियानत्रिक तत्व के देवता हैं ।धर्मशास्त्र पुराण आदि ग्रंथ तथा उपनिषदों में भी इन्हें शिल्पिकार माना गया है। विश्वकर्मा भगवान के पास अनेक प्रकार के ज्ञान विज्ञान के विशिष्ट भंडार हैं ,इसलिए वे न सिर्फ मनुष्य बल्कि देवताओं के द्वारा भी पूजे जाते हैं ।पुष्पक विमान का निर्माण विश्वकर्मा ने किया जो आदिकाल से लेकर आज जहाज के रूप में हम सभी उन्हें स्मरण करते रहते हैं। जितने भी कल पुर्जा, कारखाना, फैक्ट्री, गराज के जगह है उन स्थानों में विशेष उत्सव मनाया जाता है।देवताओं के भवनों और उनके दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुएं भी भगवान विश्वकर्मा ने ही बनाई है। देवताओं द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली सभी विशिष्ट वस्तुएं जैसे– दानवीर कर्ण का कवच कुंडल ,भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, तथा भगवान शिव का विशिष्ट त्रिशूल की रचना भी विश्वकर्मा ने ही की है। विश्वकर्मा को वैदिक देवता का मान्यता प्राप्त है। पुराणों में उनके पांच अवतारों के बारे में चर्चा की गई है जिसमें विष्णु पुराण में विश्वकर्मा के शिल्पाअवतार की कथा वर्णित है ।क्योंकि शिल्प शास्त्र के बहुत बड़े ज्ञाता थे। वे जल पर चलने योग्य खड़ाओ पादुका भी तैयार किए थे । मान्यता है कि सूर्य की मानव जीवन संहारक रश्मियों का संहार भी विश्वकर्मा ने किया।इनके द्वारा लिखे गए यंत्रशास्त्र तकनीकी ग्रंथों के रूप में आज भी उपयोगी है ,जिसमें विश्वकर्मा प्रकाश प्रमुख है। तेजगति से चलने वाले वाहनों का निर्माण विश्वकर्मा ने ही किया है।