सरकार सोती रही, गांववालों ने बांस-बल्ले से बना डाला पुल, बाढ़ में ध्वस्त हो गई थी पुलिया

प्रदीप विद्रोही, भागलपुर

जहां एक ओर नेताजी और अफसरशाही की नींद अब तक नहीं टूटी, वहीं दूसरी ओर पीरपैंती प्रखंड के ग्रामीणों ने अपने दम पर ऐसा काम कर दिखाया, जिसकी मिसाल शायद खुद बाढ़ में बहते पुल भी न दे सकें।.जी हां, बात हो रही है जिले के पीरपैंती प्रखंड स्थित उस चौखंडी पुलिया की, जो पिछले वर्ष गंगा की उफनती बाढ़ में ध्वस्त हो गई थी। और साथ ही बहा ले गई सिस्टम की सारी जिम्मेदारियां।
मालूम हो कि यह पुलिया निर्माण के महज ढाई वर्ष बाद ही ढह गई थी। जनहित में इस पुलिया के पुनर्निर्माण के लिए चौखंडी गांव के निषाद टोला के ग्रामीणों ने श्रमदान के जरिए मोर्चा संभाल लिया है। करीब 500 बांस, प्रति बांस ₹150 की दर से खरीदे गए हैं। ग्रामीणों की योजना है कि आवाजाही शुरू होने के बाद राहगीरों से स्वैच्छिक दान लिया जाएगा, ताकि भविष्य में इसी तरह की आपात स्थिति में फिर से संसाधन जुटाए जा सकें।

सांसद-विधायक ‘मौन’, ग्रामीणों ने संभाली कमान

बार-बार गुहार, व्हाट्सएप पर संदेश, हाथ जोड़कर निवेदन से लेकर धरना-प्रदर्शन तक… लेकिन न सांसद ने सुना, न विधायक ने। जब सबने आंखें मूंद लीं, तब गांववालों ने कहा – अब और नहीं!
कंधे से कंधा मिलाया, बांस काटे, बल्ले जुटाए और बना डाला देसी पुल। न इंजीनियर, न ठेकेदार, न कोई उद्घाटन – सीधे एक्शन!

मालूम हो कि लगभग साढ़े चार करोड़ रुपये की लागत से निर्मित डोमानिया-पीरपैंती-बाबूपुर भाया बाखरपुर सड़क (लंबाई: 16 किमी) के बीच चैनल नंबर 14+500 पर स्थित यह पुलिया 14 मीटर लंबी डबल भेंट स्लैब कलवर्ट थी।

जब पुल गिरा, तो गरमाई थी राजनीति

इस पुल के ध्वस्त होने पर उक्त समय नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल पर पोस्ट करते हुए लिखा था – बिहार के भागलपुर में एक और पुल ध्वस्त हुआ। नीतीश कुमार जी के शासन में भ्रष्टाचार की जड़ें जितनी गहरी हैं, पुल के पिलर उतने ही सतही हैं।
तेजस्वी के ट्वीट पर डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने पलटवार करते हुए कहा – तेजस्वी यादव नेता प्रतिपक्ष हैं। उन्हें ज़िम्मेदारी से बात करनी चाहिए। यह पुल तो उनके माता-पिता की सरकार में बना था। हम तो रख-रखाव कर रहे हैं।

50 हज़ार की आबादी, टापू बन गए थे गांव

चौखंडी पुलिया के ढहते ही, पिछली दो बाढ़ में बाबूपुर पूर्वी, बाबूपुर पश्चिमी और मधुबन पंचायतें पूरी तरह मुख्यधारा से कट गई थीं। पीरपैंती बाजार और प्रखंड मुख्यालय से जुड़ने का एकमात्र रास्ता गंगा में समा चुका था। अस्पताल जाना हो, राशन लाना हो या बच्चों का स्कूल – सब ठप! लेकिन आज बांस का पुल सिर्फ राह नहीं बना, बल्कि गांव के हौसले का प्रतीक बन गया है।

न कोई टेंडर, न कोई बजट – फिर भी बना पुल!

सरकारी प्रक्रिया का नाम लेकर अक्सर काम वर्षों तक लटका दिए जाते हैं। लेकिन इस बार बांस और बल्लों ने साबित कर दिया कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो सरकारी मशीनरी की सुस्ती को भी मात दी जा सकती है।

जवाब कौन देगा?

जब अगली बाढ़ आएगी, तब क्या फिर गांववालों को ही पुल बनाना होगा? नेता जी अगली बार वोट मांगने आएं, तो पूछिए – बांस के पुल पर चलकर आए हैं, या वादों की नाव में सवार हैं?